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Thursday, February 21, 2013

જીંદગી જીવવાની હિમ્મત કરીતી, એ તારા સાથનો દમ હતો;


જીંદગી જીવવાની હિમ્મત કરીતી, 

એ તારા સાથનો દમ હતો; 

રઙતા આંસુય પઙવા ના દીઘુ,
તારી યાદો સાચવવી એ પ્રણ હતો; 

ઈશ્વર ને ખબર છે દર્દ મારુ,
આ વરસાદમાય એજ ગમ હતો;


સ્વાભીમાન અને અહંમ વચ્ચેનો ભેદ ના જાણ્યો આપણે, 
આ  જ  વાતનો  હજીય  મને  રંજ  હતો; 

અંતર  વઘી  ગયુ  કેમ  વચ્ચે  આપણી? 
સમજ્યા  નહી  ખુંચ્યો  તે  કણ  વ્હેમ  હતોં;

યાદ  રહ્યુ  હોય  જો  તમને ,

તરન્નુમ માહોલ હતો,તારોને મારો સાથ હતો;
ગઝલ જો વાંચશો તો સમજાઈ જશે;

દરેક અક્ષરનો સહારો 'દક્ષેશ'નો પ્રેમ હતો. 

Tuesday, February 19, 2013

ये तरीका तो आजमाया जिन्दगी में पहेले भी...!

ये तरीका तो आजमाया जिन्दगी में पहेले भी...!
बहोत थे मुस्कुराये हम जिन्दगीमे पहेले भी...! 
दर्द न कभी था शरमाया जिन्दगी में पहेले भी...! 
किस्मत हुई न क्यु मजबूर जिन्दगी में पहेले भी....!!! 
---हीना त्रिपाठी

Monday, February 18, 2013

હાથ એમાં ફક્ત હાથો હોય છે,


હાથ એમાં ફક્ત હાથો હોય છે,
ભૂખનો આકાર ખોબો હોય છે. 

બે જણાંનાં મૌનની સાથે સતત, 
એમનો વાંધો બબડતો હોય છે.

પુખ્તવયનાં કાનથી સાંભળ નહીં,
 શેર મારી મુગ્ધતાનો હોય છે.
                                         
 બે લગોલગ ગોઠવેલી ઈંટથી,
 કેટલી ઘરમાં દીવાલો હોય છે? 

માછલી તો તરફડીને શાંત થઇ,
 જાળમાં જળનો નિસાસો હોય છે

. જે ઇરાદાથી થવાયું પર નહીં,
 એ ઇરાદાનો ઇરાદો હોય છે.

 તું ય અંધારાની છોડી દે ફિકર,
 રાતનો બસ રાતવાસો હોય છે.

 -ગૌરાંગ ઠાકર

Wednesday, February 13, 2013

Tanhaai kaa jasn

Tanhaai kaa jasn manaaya karta hu ,

khud ko apne sher sunaaya kartaa hu . . . . 

- NAVAZ DEOBANDI . 

रंज से ख़ूगर हुआ इन्सां तो मिट जाता है

रंज से ख़ूगर हुआ इन्सां तो मिट जाता है रंज।

मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं।

- ग़ालिब

कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है


कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है
हमसे पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी
हमने भी इस शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है
उससे बिछड़े बरसों बीते लेकिन आज जाने क्यों
आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारण धमकाया है
कोई मिला तो हाथ मिलाया कहीं गए तो बातें की
घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है 
Nida Fazli

दीवार-ओ-दर से उतर के परछाइयाँ बोलती हैं


दीवार--दर से उतर के परछाइयाँ बोलती हैं 
कोई नहीं बोलता जब तनहाइयाँ बोलती हैं

परदेस के रास्ते में लुटते कहाँ हैं मुसाफ़िर
हर पेड़ कहता है क़िस्सा पुरवाईयाँ बोलती हैं

मौसम कहाँ मानता है तहज़ीब की बन्दिशों को
जिस्मों से बाहर निकल के अंगड़ाइयाँ बोलती हैं

सुन ने की मोहलत मिले तो आवाज़ है पतझरों में
उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं 
Nida Fazli

धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो


धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो 
ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो

पत्थरों में भी ज़ुबाँ होती है दिल होते हैं
अपने घर की दर--दीवार सजा कर देखो

फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या मिले हाथ बढा़ कर देखो 
Nida Fazli

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ


देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ 
हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ

होता है यूँ भी रास्ता खुलता नहीं कहीं
जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ

साहिल की गिली रेत पर बच्चों के खेल-सा
हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ

फ़ुर्सत ने आज घर को सजाया कुछ इस तरह
हर शय से मुस्कुराता है रोता हुआ सा कुछ

धुँधली सी एक याद किसी क़ब्र का दिया
और मेरे आस-पास चमकता हुआ सा कुछ 
Nida Fazli

चांद से फूल से या मेरी ज़ुबाँ से सुनिये


चांद से फूल से या मेरी ज़ुबाँ से सुनिए
हर तरफ आपका क़िस्सा हैं जहाँ से सुनिए

सबको आता नहीं दुनिया को सता कर जीना
ज़िन्दगी क्या है मुहब्बत की ज़बां से सुनिए

क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए
मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए

मेरी आवाज़ ही पर्दा है मेरे चेहरे का
मैं हूँ ख़ामोश जहाँ, मुझको वहाँ से सुनिए

कौन पढ़ सकता हैं पानी पे लिखी तहरीरें
किसने क्या लिक्ख़ा हैं ये आब--रवाँ से सुनिए

चांद में कैसे हुई क़ैद किसी घर की ख़ुशी
ये कहानी किसी मस्ज़िद की अज़ाँ से सुनिए 
Nida Fazli
thank you